रत्नों का बीमारियों पर प्रभाव

माणिक्य

अजीर्ण : जिस व्यक्ति ने वर्मा के माणिक्य को सोने की अंगूठी में धारण कर रखा हो, वह कुनकुने पानी में अंगूठी को 13 मिनट तक हिलाए एवं उस पानी को पी ले। यदि यह बीमारी ज्यादा पुरानी हो, तो ककड़ी के रस में माणिक्य को एक घंटे तक हिला कर पीने से पुरानी बीमारी भी दूर हो जाती है।

रक्त दोष – यदि किसी व्यक्ति के शरीर में रक्त प्रवाह न होता हो, या लकवा हो, तो सीनकोना की छाल घिस कर, उसमें बर्मा के माणिक्य का भस्म मिला कर पानी के साथ पीने से लाभ होता है।

नपुंसकता  –  फॉस्फोरिक एसिड में 21 दिन तक माणिक्य लाल शीशी में रखने के बाद, उस एसिड की दस-दस बूंदें पानी में मिला कर दिन में तीन बार पीएं।

घाव – शरीर के किसी स्थान पर चोट लग गयी हो, तो उस स्थान पर माणिक्य को स्पर्श कराने से संक्रामक रोग नहीं होता है।

मस्तिष्क की दुर्बलता – यदि किसी व्यक्ति की स्मरण शक्ति कमजोर हो गयी हो, तो माणिक्य का भस्म मलाई के साथ खाने से आर्श्वयजनक लाभ मिलता है।

इसके अलावा क्षय रोग, खूनी दस्त, पीलिया आदि बीमारियों में भी माणिक्य अपना प्रभाव दिखाता है। माणिक्य मस्तिष्क के ट्यूमर एवं कैंसर में लाभदायक है रीढ़ के तमाम रोग, दोष एवं विकार आदि से छुटकारा दिलाने में माणिक्य महत्वपूर्ण भूमिका निभाता है। यहां यह याद रखना आवश्यक है कि माणिक वर्मा की खान का हो ।

मोती

मोती चंद्रमा का रत्न है। इसमें 90 प्रतिशत चूना होता है। अतः कैल्शियम की कमी के कारण उत्पन्न रोगों में मोती का उपयोग लाभदायक होता है, जैसे, स्मरणशक्ति बढ़ाने के लिए अथवा मंद बुद्धि वालो को मोती का भस्म सेवन कराने से लाभ मिलता है। इसके अलावा वायु विकारों से संबंधित रोग सदा के लिए दूर हो जाते हैं। आंखों में मोती का अंजन लगाने से नेत्र रोग में आशातीत लाभ होता है।

बसरा मोती के भस्म का अनुभवी वैद्य के परामर्श से सेवन करने से पतन, घात से संबंधित गुप्त रोग में शीघ्र लाभ होता है। चक्कर आने क्षय रोग, खांसी में भी मोती का भस्म बहुत लाभ करता है। अत्यधिक मानसिक श्रम करने वालों के लिए यह रामबाण दवाई है।

इसके अलावा चक्कर आने पर यौन शक्ति को बढ़ाने, खांसी दूर करने के लिए मोती के भस्म का सेवन करना चाहिए। मोती बसरा का होना चाहिए।

हीरा

हीरे के भस्म से अनेक प्रकार के रोगों का निवारण हो जाता है।

संभोग की शक्ति की कमी में हीरे के भस्म का सेवन करने से संभोग शक्ति बढ़ जाती है, या ब्लू डायमंड’ की अंगूठी को मुंह में रख कर संभोग करने से सामान्य से अधिक देर तक आनंद उठाया जा सकता है। मंदाग्नि रोग में यदि हीरे के भस्म को शहद के साथ चटाया जाए तो आश्चर्यजनक लाभ मिलता है।

काम वासना में कमी होने पर महिला एवं पुरुष दोनों को हीरा धारण करना चाहिए। इससे दोनों में काम वासना बढ़ेगी एवं यदि आपस में झगड़ा होता है, तो वह समाप्त हो जाएगा ।

फॉस्फोरिक एसिड में हीरे को सफेद शीशी में 7 दिन तक रख कर उस एसिड को दस बूंद पानी के साथ सेवन करने से अंधापन, हिस्टीरिया, भगंदर एवं फेफडे संबंधी रोग ठीक हो जाते हैं।

पन्ना

पन्ना उत्तम विषनाशक रत्न है। पन्ने की पिष्टी बना कर गुलाब जल के साथ सेवन करने से अम्ल तथा पित्त दूर होते हैं, शरीर में जहरीली वस्तु का नाश होता है। हृदय की दुर्बलता तथा उच्च रक्तचाप में पन्ना की पिष्टी बहुत लाभ प्रदान करती है।

पन्ने का भस्म दमा, अजीर्ण, बवासीर एवं पीलिया रोग के लिए लाभदायक है। यदि गर्भवती स्त्री पन्ने की अंगूठी कमर पर धारण कर ले, तो प्रसव के समय पीड़ा नहीं होती है। प्रायः पन्ना बौद्धिकता को एकाग्र एवं तरोताजा बनाए रखता है। इसलिए चिकित्सक शल्य क्रिया के क्षणों में हरा वस्त्र धारण करते हैं।

रत्नों का बीमारियों पर प्रभाव

गर्भवती औरतें अक्सर मिट्टी खाने लगती हैं। गर्भ काल में उन्हें पन्ना पहनाने से यह आदत छूट जाती है।

लहसुनिया

लहसुनिया केतु ग्रह का रत्न है। इसके अशुभ होने से जो रोग उत्पन्न होते हैं, उनके लिए इसका उपयोग किया जाता है, जैसे

नपुंसकता – लहसुनिया का भस्म नामर्दी दूर करने के लिए चमत्कारिक रूप से कार्य करता है। किसी भी शुक्रवार के दिन इसके भस्म को गाय के घी के साथ मिला कर सेवन करने से यह बीमारी दूर हो सकती है। गुप्त रोग कार्मे, सुजाक, उपदंश जैसे गुप्त रोगों में दूध के साथ लहसुनिया का भस्म सेवन करने से लाभ होता है।

प्रसव पीडा – प्रसव में विलंब हो रहा हो, तकलीफ हो रही हो, तो लहसुनिया स्त्री के बालों में बांध देना चाहिए । इससे प्रसव, बिना कष्ट के, शीघ्र हो जाता है, या कटलफीश नामक मछली के तेल में लहसुनिया 10 घंटे रख कर पानी के साथ पीने से प्रसव आसानी से होता है।

नेत्र रोग – नेत्र रोगी को लहसुनिया का भस्म एवं पीपल की राख मिला कर खाने से लाभ होता है।

श्वास रोग – लहसुनिया को गले में बांध देने से श्वास संबंधी रोगों में लाभ होता है। लहसुनिया कनक खेत का होना चाहिए।

नीलम

शनि के कुप्रभाव से उत्पन्न रोगों में, औषधि के रूप में नीलम का उपयोग किया जाता है, जैसे – वात एवं दर्द गठिया, संधिवात, स्नायविक दर्द आदि रोगों में नीलम के भस्म को शहद के साथ खाने से लाभ होता हैं

श्वास एवं मस्तिष्क रोग – श्वास रोग, दमा, मिरगी आदि रोगों में नीलम का भस्म मलाई में खिलाने से शीघ्र ही आराम मिलता है।

पागलपन – यदि कोई जन्म से पागल नहीं है, तो नीलम के भस्म को पान के रस के साथ खाने से लाभ होता

नेत्र रोग – जम्मू की खदान के नीलम को गुलाब जल के साथ एक घंटे तक हिलाया जाए एवं उस जल को नेत्र में डाला जाए तो नेत्र रोग दूर होते हैं।

याददाश्त – नीलम को जम्मू के अल्कोहल में नीले रंग की बोतल में 18 दिन रख कर उस अल्कोहल को पानी के साथ पीने से याददाश्त बढ़ती है।

मूंगा

मंगल ग्रह के कुप्रभाव से उत्पन्न रोगों में औषधि के रूप में मूंगा इस प्रकार उपयोग किया जाता है: आयुर्वेद में मूंगे को प्रवाल के नाम से जाना जाता है। मूंगा वात, पित्त एवं कफ तीनों को समाप्त करने में सक्षम है।

वीर्य को गाढ़ा करने तथा मस्तिष्क को शक्ति देने के लिए गाय के दूध के साथ मूंगा के भस्म का सेवन किया जाता है। भूख बढ़ाने एवं पाचन क्रिया के लिए मूंगे का भस्म सर्वश्रेष्ठ है।

हृदय रोग, नजर दोष, भूत-प्रेत, आंधी-तूफान, बिजली, छाया के प्रभाव को नष्ट करने के लिए मूंगे का उपयोग होता है।

मूंगे को गुलाब जल में घिस कर गर्भवती स्त्री पेट पर लगाने से उसका गर्भ स्थिर हो जाता है। मूंगे के भस्म को शहद के साथ चटाने से शरीर पुष्ट होता है। हड्डियों की कमजोरी, स्त्री का प्रदर रोग, रक्तचाप में मूंगे के भस्म से शीघ्र लाभ होता है।

पुखराज के साथ यदि मूंगा धारण किया जाए तो मधुमेह शर्करा इत्यादि को नियंत्रित किया जा सकता है।

बेरों के ढेर में दो-चार मूंगा डाल कर, उन्हें चार-पांच दिन बाद खाने से शरीर को अतुल शक्ति प्राप्त होती है तथा मानव में पौरुष की अधिकता आती है।

गोमेद

  • राहु के कुप्रभाव से उत्पन्न रोगों में, औषधि के रूप में गोमेद का उपयोग इस प्रकार किया जाता है ।
  • यह दुर्गंध, गर्मी, वायु गोला, बवासीर त्वचा रोग आदि में उपयोग होता है। संतान में वृद्धि तथा शत्रु भय का नाश होता है।
  • गोमेद का भस्म मलाई में सेवन करने से कफ, क्षय तथा पीलिया में आश्चर्यजनक लाभ होता है।
  • मिरगी, बवासीर, नेत्र रोग में गोमेद का भस्म रामबाण सिद्ध होता है।
  • चर्म रोग, कृमि, शरीर के भारहीन होने में भी गोमेद रत्न का भस्म उपयोग किया जाता है।

पुखराज

  • बृहस्पति के कुप्रभाव से उत्पन्न रोगों में, औषधि के रूप में, पुखराज का उपयोग किया जाता है।
  • यह आध्यात्मिक विचार एवं मानसिक स्थिरता प्रदान करता है।
  • यह भूत-प्रेत, बाधा, कष्ट, पागलपन आदि को दूर करता है।
  • पुखराज के भस्म और उसकी पिष्टी से वात, कफ, कुष्ठ रोग, नकसीर शीघ्र दूर हो जाते हैं। यह विष के प्रभाव को निष्क्रिय करने में सफल रहता है।
  • पुखराज रत्न मुंह में रखने से दांत मजबूत होते हैं एवं मुंह से सुगंध आती है।
  • यह यकृत रोग, दस्त, मिरगी, प्रदर के कष्ट में बहुत उपयोगी है। वीर्य को उत्पन्न एवं गाढ़ा करने में भी यह बहुत लाभदायक है।

नौ रत्नों के अलावा चौरासी उपरत्न भी होते हैं। ये भी बीमारियों में अचूक लाभ पहुंचाने वाले हैं।

माहेमरियम – यह उपरत्न है, जिसे बवासीर से परेशान व्यक्ति को अंगूठी में धारण करना चाहिए और उस अंगूठी को दिन में 7 – 8 बार चाटना चाहिए। इससे बवासीर के मरीज को लाभ होता है।

दानाफिटंग – यह ऐसा उपरत्न है, जिस पर दिल जैसा निशान बना होता है। गुर्दे की बीमारी वाले व्यक्ति को इसका पेंडेंट बना कर पहनना चाहिए।

कहरवा – इसका नाम का अर्थ है दुःख भगाने वाला । इस रत्न को पहनने से दुःख भाग जाता है। दिल के मरीज को सोने में कहरवा पहनना चाहिए। असली कहरवा के अभाव में यशव की तख्ती भी पहन सकते हैं।

यहां सबसे महत्वपूर्ण बात यह है कि रत्न चिकित्सा अनुभवी व्यक्ति की सलाह से ही करें। मांसाहारी एवं अधिक शराब, भांग, गांजा का सेवन करने वाले व्यक्ति को इस चिकित्सा से बहुत देर से लाभ होता है।

यदि कोई इसकी लंबी प्रक्रिया में नहीं जाना चाहता हो, तो एक संक्षिप्त रास्ता यह है कि जो नौ ग्रह मानव शरीर के विभिन्न अंगों को प्रभावित करते हैं, जैसे

सूर्य – सिर, पेट, नेत्र, जांघ, पीठ, रीढ़ और गर्भाशय

चंद्र – छाती, रक्त, गाल, नेत्र

मंगल – नाड़ी, रक्त, भुजा, आंत, गला

बुध – त्वचा, गुर्दा, कोहनी, गर्दन, पित्त

गुरु – धमनी, जिगर, पैर, जांघ, छाती चर्बी

शुक्र – जीभ, गुप्तांग, रज, वीर्य, नाभी

शनि – धमनी, पसली, पिंडली, टांग

राहु – गैस, नितंब, दांत, सिर का ऊपरी हिस्सा

केतु – पैर पंजे, नाखून

इन बीमारियों से संबंधित रत्न धारण कर उन्हें दूर कर सकते हैं। रत्नों पर सूर्य की किरणें पड़ने से रत्नों के माध्यम से वे किरणें तो शरीर पर पड़ेगी, लेकिन शरीर में उस किरणों को सहन करने की कितनी ताकत है, यह अलग-अलग व्यक्तियों में अलग-अलग हो सकती है।

जिस प्रकार शल्य क्रिया से पूर्व मरीज को क्लोरोफार्म सुंघाया जाता है, तो कोई व्यक्ति थोड़ा सा सूंघ कर बेहोश हो जाता है और किसी मरीज के लिए इसकी मात्रा बढ़ानी पड़ती है, इसी प्रकार किसी रत्न से मानव को तत्काल लाभ मिल जाता है और किसी को देर में। लेकिन लाभ तो अवश्य होता ही है।

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